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अब नए नाम की डिग्री ले लो.


आर्ट्स पढ़ें या साइंस, सभी में मिलेगी बीएस और एमएस डिग्री!

डाॅ. सुशील उपाध्याय/उत्तराखंड लाइव :  यूजीसी ने जुलाई, 2014 में डिग्रियों के नए नोमेनक्लेचर जारी करते हुए कुल 129 तरह के उपाधि नामों को स्वीकृति दी थी। इस सूची से इतर सभी उपाधि नामों (नोमेनक्लेचर) को अमान्य घोषित कर दिया था। अब नए सिरे से नामों के निर्धारण की कवायद शुरू हुई है। उपाधि नामों में सुधार और संशोधन के पीछे राष्ट्रीय शिक्षा नीति को आधार बताया गया है। इसके लिए यूजीसी ने एक कमेटी गठित की थी, जिसने अपनी सिफारिशें सौंप दी हैं। इन सिफारिशों में विरोधाभासों और निर्बंध उपाधि नामों की संभावनाओं का अंबार लगा हुआ है। उम्मीद की जा रही है कि यूजीसी नए नामों को जल्द ही अधिसूचित कर देगी।


विशेषज्ञ समिति ने जिन उपाधि नामों की अनुशंसा की है, उन्हें देखकर लग रहा है कि आने वाले दिनों में उपाधि नामों की संख्या बढ़ने जा रही है। सबसे उल्लेखनीय बदलाव यह है कि चार वर्ष की स्नातक उपाधि का नाम बीएस यानी बैचलर ऑफ साइंस हो जाएगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि बीएस उपाधि नाम के साथ सभी विषयों की डिग्री दी जाएंगी। जो छात्र आर्ट्स, कॉमर्स, साइंस, इंजीनियरिंग, सोशल साइंस आदि के साथ 160 क्रेडिट की डिग्री पूरी करेंगे, उन सभी को बीएस उपाधि मिलेगी। इससे साफ है कि यह उपाधि केवल साइंस तक सीमित नहीं रहेगी। यह मानक एक साल और दो साल की मास्टर डिग्री पर भी लागू होगा। मास्टर लेवल पर सभी विषयों/संकायों में एमएस उपाधि दी सकेगी। (हालांकि, मेडिकल साइंस वाला एमएस पहले से ही मौजूद है। ऐसे में मेडिकल से इतर विषयों में स्नातकोत्तर उपाधि के लिए एमएस उपाधि नाम प्रस्तावित किया जाना औचित्यपूर्ण नहीं लगता।)
बीएस और एमएस उपाधि नामों को देखकर ऐसा लग सकता है कि यह कोई उल्लेखनीय बात होने जा रही है। लेकिन वास्तविकता यह है कि दुनिया के अनेक देशों में पहले से ही बीएस और एमएस उपाधि प्रदान की जा रही हैं। विशेषज्ञ समिति की मौजूदा रिपोर्ट में सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण बात यह है कि ज्यादातर मौजूदा नाॅमिनक्लेचर को ज्यों का त्यों रखते हुए उनके लिए नए नाॅमिनक्लेचर प्रस्तावित कर दिए गए हैं। इससे यूजीसी का वर्ष 2014 का वो प्रयास सिर के बल खड़ा हो गया है, जिसमें उपाधि नामों की संख्या को नियंत्रित किया गया था। उदाहरण के लिए समिति की अनुशंसाओं में कहा गया है कि तीन वर्षीय बीए, बीकाॅम, बीएसएसी नामों को जारी रखते हुए इन विषयों की चार वर्षीय डिग्री को बीएस भी कहा जाएगा। इसी तरह इनका नाम बीए/बीकॉम/बीएससी ( ऑनर्स विद रिसर्च) भी हो सकता है। इसके साथ वर्तमान में संचालित बीए/बीकॉम/बीएससी (ऑनर्स) भी जारी रहेगा।

 

इस क्रम में यह बात भी ध्यान देने वाली है कि यदि किसी विश्वविद्यालय को ऐसा लगता है कि उसकी उपाधि का नाम उपर्युक्त से भिन्न होना चाहिए तो वह यूजीसी को आवेदन कर सकता है। उपर्युक्त अनुशंसाओं में यह भी प्रस्तावित किया गया है कि संबंधित विश्वविद्यालय उपाधि नाम के आगे ब्रैकेट में विषय का उल्लेख भी कर सकते हैं। जैसे बैचलर ऑफ आर्ट्स इन म्यूजिक या बैचलर ऑफ साइंस इन जिओलाॅजी। इन्हें संक्षेप में बीए (म्यूजिक) या बीएससी (जिओलॉजी) भी कहा जा सकेगा। इस समिति ने विश्वविद्यालय स्तर की डिग्रियों को 11 स्तरों में बांटा है। एक वर्ष की पढ़ाई पर यूजी सर्टिफिकेट, दो वर्ष की पढ़ाई पर यूजी डिप्लोमा, तीन वर्ष की पढ़ाई पर स्नातक, चार वर्ष की पढ़ाई पर स्नातक ( ऑनर्स विद रिसर्च), पांच वर्ष की पढ़ाई पर स्नातकोत्तर डिग्री मिलेगी। इनके बीच में एक मामला पीजी डिप्लोमा का भी है। इसे चार वर्षीय डिग्री के समान लेवल पर रखा गया है।

गैरतकनीकी विषयों में तीन वर्ष की स्नातक के बाद स्नातकोत्तर डिग्री दो वर्ष की होगी, जबकि चार वर्ष की डिग्री के बाद स्नातकोत्तर डिग्री एक वर्ष की होगी। (आप चाहें तो वर्ष आगे-पीछे किए जाने को पर बड़ा बदलाव मान सकते हैं!) इंजीनियरिंग विषयों में चार वर्ष की बीटेक/बीई (जिन्हें बीएस भी कहा जाएगा) के बाद दो वर्ष की मास्टर डिग्री होगी। संभवतः इसी आधार पर एमए, एमकाॅम, एमएमसी की तुलना में एमटेक/एमई का क्रेडिट लेवल ज्यादा रखा गया है। एमए, एमकाॅम, एमएमसी का केडिट लेवल साढ़े छह है, जबकि एमटेक/एमई का क्रेडिट लेवल सात है। इससे तय हो गया कि सांइस से जुड़े विषयों की स्नातकोत्तर उपाधि इंजीनियरिंग उपाधि से कमतर मानी जाएगी। उपाधि नामों की नई सूची में से एमफिल को हटा दिया गया है। सबसे ऊंचे स्तर पर पीएचडी होगी। संभवतः इस डिग्री को पूर्व की तरह ही डीफिल भी कहा जाता रहेगा।
इस समिति ने डी.लिट और डी.एससी का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। इसी प्रकार संस्कृत साउंडिंग नोमेनक्लेचर का भी कोई उल्लेख नहीं किया गया है। अरबी-फारसी की परंपरागत डिग्रियों के नामों के बारे में भी कोई अनुशंसा नहीं की गई है। समिति की अनुशंसाओं में एक विरोधाभासी बिंदु यह है कि डिग्री हेतु निर्धारित क्रेडिट स्कोर प्राप्त होने के बाद संबंधित डिग्री अवार्ड करने के लिए न्यूनतम समय सीमा को नहीं देखा जाएगा। जबकि समिति की रिपोर्ट में नोमेनक्लेचर की लिस्ट में हरेक उपाधि के साथ न्यूनतम समय अवधि का उल्लेख किया गया है। न्यूनतम समयावधि की बजाय निर्धारित क्रेडिट स्कोर को प्राथमिकता देने की सिफारिश बेहद आकर्षक तो है, लेकिन भविष्य में इससे कई प्रकार की तकनीकी समस्याएं खड़ी होंगी। उदाहरण के लिए यदि कोई छात्र तीन वर्ष की स्नातक उपाधि के लिए निर्धारित 120 क्रेडिट स्कोर को दो वर्ष में प्राप्त कर लेता है तो उसे दो वर्ष की स्नातक उपाधि दी जाएगी या तीन वर्ष की ? यदि दो वर्ष की स्नातक उपाधि दी जाएगी तो इसे मान्य किए जाने की प्रक्रिया कब निर्धारित होगी ? और दो वर्ष में उपाधि पूरी करने के बाद यदि संबंधित छात्र स्नातकोत्तर में प्रवेश लेना चाहे तो क्या उसे प्रवेश दिया जाएगा, इस पर भी समिति की ओर से कुछ नहीं कहा गया है।

 

एक खास बात यह कि पीएचडी में प्रवेश के लिए न्यूनतम अर्हता क्रेडिट लेवल 6 यानी चार वर्षीय स्नातक ( ऑनर्स विद रिसर्च) उपाधि को को अर्हता बताया गया है, लेकिन क्रेडिट लेवल 6.5 यानी एमए, एमएससी, एमकाॅम अैर क्रेडिट लेवल 7 यानी एमटेक/एमई को छोड़ दिया गया है। समिति ने अपनी मंथन प्रक्रिया में तीन वर्ष डिप्लोमा को अनदेखा कर दिया है। जबकि, ऑल इंडिया हायर एजुकेशन सर्वे के लिए भारत सरकार ने 10वीं के बाद के तीन वर्षीय डिप्लोमा को उच्च शिक्षा में सम्मिलित माना है। इसका एक अन्य पहलू यह है कि अनेक विश्वविद्यालयों द्वारा तकनीकी और इंजीनियरिंग क्षेत्र में तीन वर्षीय डिप्लोमा का संचालन किया जा रहा है। इस रिपोर्ट की अंतिम अनुशंसा यह है कि नोमेनक्लेचर निर्धारण संबंधी रिपोर्ट को यूजीसी की स्टैंडिंग कमेटी को सौंप दिया जाए। इसका अर्थ यह है कि इनमें जो भी संशोधन या बदलाव होंगे, उन्हें स्टैंडिंग कमेटी देखेगी और उसके अगले क्रम में यूजीसी इन्हें अधिसूचित करेगी। तब तक और शायद उसके बाद भी मौजूदा नोमेनक्लेचर जारी रहेंगे।

स्थिति ये है कि यूजीसी की अधिसूचना के बाद नाॅमिनक्लेचर की संख्या बढ़ जाएगी। इस बढ़ी संख्या के साथ गुणवत्ता में कोई सुधार आएगा या नहीं, इसके लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। सच बात यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जारी होने के बाद जितने प्रकार की सूचनाएं, नियम-निर्देश और नोटिफिकेशन यूजीसी द्वारा जारी किए गए हैं, उन्ह सभी को एक साथ रखकर पढ़ लिया जाए तो विरोधाभासों का पिटारा खुल जाता है। आप चाहें तो इस विषय को और बेहतर ढंग से समझने के लिए नेशनल क्रेडिट फ्रेमवर्क तथा कैरिकुलम एंड क्रेडिट फ्रेमवर्क फाॅर यूजी प्रोगाम वाले दस्तावेज को पढ़ सकते हैं।
डाॅ. सुशील उपाध्याय
9997998050

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