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एचoएनoबीo विश्वविद्यालय, बंजर भूमि को आबाद कर, जगा रहा स्वरोजगार की अलख।


क्षेत्र की महिलाओं को दे रहा पौध तैयार करने का विशेष प्रशिक्षण।

स्वरोजगार की अलख जगा रहा विश्वविद्यालय का उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी एवं शोध संस्थान (हैप्रक)।

आशीष लखेड़ा/उत्तराखण्ड लाइव: पिछले लंबे समय से उत्तराखण्ड के श्रीनगर गढ़वाल सहित राज्य के विभिन्न जिलों के बंजर और बदहाल पड़े खेतों की दशा अब बदली—बदली सी नजर आ रही है। खाली बेकार पड़े जिन खेतों में जंगली घास और खरपतवार उग गए थे। वहाँ अब राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय बाजारों में मंहगे दामों में बिकने वाले दुर्लभ और गुणकारी औषधीय पौधे दिख रहे हैं। इसके साथ ही क्षेत्र की महिलाएं सीधे तौर पर औषधीय पौधों की खेती व लघु उद्योग से जुड़कर अपना भविष्य साकार करने की राह पर हैं। इस परिवर्तन का माध्यम बना हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी एवं शोध संस्थान(हैप्रक)।

 

बंजर

 

 

 

 

 

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में उगने वाली वन औषधीयों के पारम्परिक चिकित्सा ज्ञान के विस्तार, विश्वविद्यालयों में इसे विषय के रूप में शामिल कर वर्तमान पीढ़ी के समक्ष इसे व्यवहार में लाने व किसानों के लिए इसे जीवकोपार्जन का साधन बनाने के उद्देश्य से वर्ष 1988 में उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी एवं शोध संस्थान (हैप्रक) ने धरातल पर कार्य करना शुरू किया। जिसके फल स्वरूप आज राज्य के विभिन्न जिलों में बंजर खेतों की हरियाली लौट आई है।

रंग ला रही घर से घर तक पहल: विश्वविद्यालय की घर से घर तक कार्यक्रम के तहत क्षेत्र की महिलाओं व काश्तकारों को वाहन सुविधा के जरिए ट्रेनिंग स्थल तक लाया जाता है। जहाँ विषय विशेषज्ञों द्वारा उन्हें विशेष वैज्ञानिक तकनीक पर आधारित प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके साथ ही विशेषज्ञों की टीम के साथ उन्हें फील्ड स्टडी के लिए भी भेजा जाता है। साथ ही प्रतिभागियों को इससे जुड़े उद्योग और उनकी विपणन प्रणाली के बारे में भी समझाया जाता है।

डॉ0 विजय कान्त पुरोहित : वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख अन्वेषक(हैप्रक) ने बताया कि — विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो० अत्नपूर्णा नौटियाल के मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय के कैम्पस विकास अनुभाग एवं हैप्रेक द्वारा विश्वविद्यालय की वर्षों से बंजर पड़ी भूमि को आजीविका आधारित वन के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहाँ पर वानिकी, उधानिकी, औषधीय एवं सब्जी उत्पादन के समन्वयन से बंजर भूमि को विकसित किये जाने का नमूना तैयार करने के साथ ही स्थानीय लोगों को जागरूक करने की दृष्टि से शैक्षणिक भ्रमण करवाकर जानकारियाँ प्रदान की जा रही हैं। कुलपति के निर्देश पर ई० महेश डोभाल द्वारा इस नमूने को अमलीजामा पहनाया गया है जो कि आज स्थानीय जनता द्वारा खूब सराहा जा रहा है।

घर से घर तक कार्यक्रम में हैप्रेक के निदेशक प्रो० एम० सी० नौटियाल द्वारा बताया गया कि विश्वविद्यालय द्वारा शोध आधारित परिणामों के आधार पर वर्षों की मेहनत से हैप्रेक वाला जंगल भी विकसित किया गया है। जिसमें 70 प्रकार की पादप प्रजातियाँ एक ही स्थान पर उगाकर पर्यावरण एवं पर्यटन की दृष्टि से श्रीनगर के लोगों को लाभ दे रही हैं।

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बंजर

घर से घर तक कार्यक्रम के संयोजक डॉ० विजय कान्त पुरोहित,सह-संयोजक, प्रदीप डोभाल एवं जयदेव चौहान द्वारा महिलाओं को चित्रा गार्डन में भ्रमण करवा कर वहां पर लगाये गए वानिकी, उधानिकी एवं औषधीय पौधों की जानकारियां प्रदान की गयी। ई० महेश डोभाल नें कार्यक्रम की सार्थकता पर जोर देते हुए महिलाओं से अपने अपने गावों में विश्वविद्यालय की सहायता से बंजर भूमि को आजीविका आधारित बनाने हेतु प्रयास करने की बात कही। कार्यक्रम में कुलदीप सिंह रावत, शुभम भट्ट, मनोज कुमार, कमल सिंह पुंडीर, राकेश बडोनी, मोनाली चौहान,अल्का सती ने महिलाओं को पेड़ पौधों की जानकारी देने के साथ ही घर लाने तथा ले जाने में सहायता की गयी।

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