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महज एक डिजिटल यूनिवर्सिटी नाकाफी है!


देश में नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद ये दूसरा बजट था, शिक्षा से जुड़े लोग व्यापक बदलाव की उम्मीद लगाए हुए थे, लेकिन बजट घोषणाओं के लिहाज से नई शिक्षा नीति पर सरकार ने केवल सांकेतिक कदम ही उठाए हैं। इस बार के बजट में दो घोषणाओं को देख सकते हैं। पहली घोषणा डिजिटज यूनिवर्सिटी की स्थापना करना है और दूसरी घोषणा हरेक कक्षा के लिए अलग टीवी चैनल शुरू करने की है। दोनों घोषणाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन शिक्षा जितना व्यापक क्षेत्र है, उस लिहाज से दोनों घोषणाओं को किसी क्रांतिकारी निर्णय या व्यापक बदलाव के आधार के तौर पर नहीं देख सकते। मसलन, नई शिक्षा नीति में तय किया गया है कि वर्ष 2030 तक 17 से 23 वर्ष तक के कुल युवाओं में से आधे युवाओं को काॅलेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर पंजीकृत कराना है। (ग्राॅस एनरोलमेंट रेशियो अर्थात जीईआर को 50 फीसद तक करना।) इस लिहाज से वर्ष 2030 की डेडलाइन तक उच्च शिक्षा में करीब सात करोड़ युवाओं का पंजीकरण होगा।

फिलहाल देश में मौजद करीब 1100 यूनिवर्सिटियों और करीब 50 हजार काॅलेजों में इतनी कैपिसिटी नहीं है कि वे सात करोड़ युवाओं को पंजीकृत कर सकें। इसके लिए मौजूदा बुनियादी ढांचे और मानव संसाधन, विशेष तौर पर शिक्षकों की संख्या को करीब दो गुना तक बढ़ाना होगा जो तभी संभव है जब उच्च शिक्षा के बजट में अगले सात-आठ साल तक हर साल कम से कम 10 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो सके। और यह बढ़ोत्तरी केवल केंद्रीय बजट तक सीमित न हो, बल्कि राज्य सरकारें भी इसी के अनुरूप बढ़ोत्तरी करें। मौजूदा हालात में 10 फीसद की बात तो दूर यदि 5 फीसद की सालाना बढ़ोत्तरी भी हो पाए तो यह अपने आप में बहुत बड़ी बात होगी। चूंकि, बुनियादी ढांचा और शिक्षकों की संख्या में अचानक कोई चमत्कारिक बदलाव या बढ़ोत्तरी नहीं होनी है तो फिर इसका समाधान गैर-परंपरागत तरीकों में ढूंढना होगा। उसी की एक छोटी कड़ी डिजिटल यूनिवर्सिटी की स्थापना करना है।
यह यूनिवर्सिटी कैसी होगी, किस प्रकार संचालित होगी और किस तरह की उपाधियां संचालित करेगी, इस ब्यौरे के लिए अभी कुछ इंतजार करना पड़ेगा। अगर यह मान लें कि इस यूनिवर्सिटी में तत्काल ही बहुत बड़ी संख्या में पंजीकरण हो जाएं तो भी इस तरह की एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों यूनिवर्सिटियों की जरूरत होगी ताकि वे अलग-अलग क्षेत्रों और विषयों के युवाओं का पंजीकरण कर सकें। बेहतर तो यह होगा कि अलग से डिटिजल यूनिवर्सिटी बनाने की बजाय देश की राष्ट्रीय ओपन यूनिवर्सिटी इग्नू को समानांतर तौर पर नेशनल डिजिटल यूनिवर्सिटी में तब्दील किया जाए। और इग्नू को ही ओपन एजुकेशन को डिजिटल माध्यमों के साथ ब्लेेंडेड मोड में उपाधिया संचालित करने और उनके नियमन-नियोजन का जिम्मा दिया जाए। इसी क्रम में राज्य स्तरीय ओपन यूनिवर्सिटियों, जिनकी संख्या एक दर्जन से अधिक है, को भी स्टेट डिजिटल यूनिवर्सिटी में बदल दिया जाए। इससे बड़ा लाभ यह होगा कि इन यूनिवर्सिटियों के पास पहले से मौजूद संसाधनों का और बेहतर ढंग से इस्तेमाल हो सकेगा। इसके अलावा देश भर में अन्य सभी यूनिवर्सिटियों में डिजिटल एजुकेशन डिपार्टमेंट स्थापित किए जाएं ताकि वहां संचालित उपाधियां डिजिटल मोड में भी उपलब्ध हो सकें। इन यूनिवर्सिटियों में नए डिपार्टमेंट शुरू करने की बजाय पहले से संचालित सतत शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, दूरस्थ शिक्षा आदि विभागों को भी डिजिटल एजुकेशन डिपार्टमेंट में परिवर्तित करने पर विचार किया जा सकता है।
ऐसे में डिजिटल माध्यम की उपाधियों के संचालन के लिए संबंधित यूनिवर्सिटियों के शिक्षकों और संसाधनों का भी प्रयोग किया जा सकेगा। इसी तरह का एक प्रयोग मद्रास आईआईटी द्वारा किया गया है, जिसमें आॅनलाइन माध्यम से बीएससी प्रोग्राम उपलब्ध कराया गया है। इग्नू ने भी पीजी स्तर पर एमए इन सस्टेनेबल साइंस में दो साल का प्रोग्राम शुरू किया है। ये प्रोग्राम नई शिक्षा नीति के अनुरूप ‘मल्टीपल एंट्री-मल्टीपल एग्जिट’ का अवसर भी देता है। इस वक्त इसी प्रकार के ‘मिश्रित-माध्यमों’ की उपाधियों की आवश्यकता है। और इसके लिए मौजूदा यूनिवर्सिटियों में ही सुविधाओं का विकास करना ज्यादा ठीक होगा क्योंकि किसी भी नई यूनिवर्सिटी की स्थापना और उसके पूर्ण क्षमता में कार्य करने में करीब पांच-छह साल का समय लग जाता है। ऐसे में महज एक डिजिटल यूनिवर्सिटी के आधार पर किसी उल्लेखनीय बदलाव के लिए पांच-छह साल की इंतजार करना ठीक नहीं होगा। और यह उम्मीद करना भी सही क नहीं होगा कि फिलहाल काॅलेजों और यूनिवर्सिटियों से बाहर शेष बचे करोड़ों युवाओं को ऐसी कुछ गिनी-चुनी डिजिटल यूनिवर्सिटी अपने भीतर समेट लेंगी।
यहां यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि सबसे बेहतरीन डिजिटल यूनिवर्सिटी में भी पाठ्यक्रम के कुछ हिस्सों को आॅफलाइन रखना ही होगा। इसमें लैब वर्क, फील्ड वर्क आदि को डिजिटल या आॅनलाइन करना ठीक नहीं होगा। यानि मिली-जुली पद्धति ही काम आएगी। अब, पुनः नई शिक्षा नीति के उस बिंदू पर आते हैं जहां ग्राॅस एनरोलमेंट बढ़ाने के साथ-साथ एजुकेशन को आॅनलाइन और डिजिटल करने की बात कही गई है, इस बिंदू के दृष्टिगत इस साल के बजटीय प्रावधान बहुत बड़ी उम्मीद नहीं जगाते। और हां, नए जमाने की डिटिजल यूनिवर्सिटियों में पढ़ाई के माध्यम का प्रश्न भी एक बड़ा प्रश्न बनकर सामने होगा क्योंकि यदि ये यूनिवर्सिटी भी मद्रास आईआईटी के  आॅनलाइन बीएससी प्रोग्राम या इग्नू के एमए इन सस्टेनेबल साइंस प्रोग्राम की तरह अंग्रेजी माध्यम में ही संचालित होंगी तो फिर न डिटिजल डिवाइड खत्म होगा और न ही नई शिक्षा नीति का उद्देश्य पूर्ण हो सकेगा।

सुशील उपाध्य

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