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विश्व के 117 देशों के साधक सीख रहे गीता ज्ञान।


परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और गीता परिवार के अध्यक्ष स्वामी गोविन्दगिरिजी ने आज आनलाइन प्लेटफार्म के माध्यम से विश्व के अनेक देशों के हजारों गीता प्रेमियों से जुड़कर गीता का दिव्य संदेश दिया।
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि महाग्रंथ गीता सनातन धर्म तथा वेदांत दर्शन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। जिसमें ज्ञान, भक्ति तथा कर्म तीनों मार्गों द्वारा मोक्ष प्राप्ति का रहस्य बताया गया है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने जीवन के हर पहलू का वर्णन करते हुये स्थितप्रज्ञ की अवधारणा का दिव्य मंत्र दिया और कहा कि निष्काम कर्मयोग का पालन करने वाला व्यक्ति ही स्थितप्रज्ञ कहलाता है। व्यवहारिक रूप से देखें तो यदि व्यक्ति सुख से सुखी नहीं है और यदि वह दुख से दुखी नहीं है वही स्थितप्रज्ञ है।
जीवन में आने वाले सुख व दुख दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू हैं। सुख और दुख दोनों का जीवन में आना-जाना निश्चित हैं ठीक वैसे ही जैसे दिन के बाद रात्रि और जीवन के बाद मृत्यु का आना तय है इसलिये मनुष्य को सभी इच्छाओं से ऊपर उठकर निष्काम कर्म करते रहना चाहिये। स्थितप्रज्ञ से तात्पर्य अकर्मण्य होना नहीं है बल्कि प्रत्येक परिस्थिति में सम रहने से है।
गीता परिवार के अध्यक्ष स्वामी गोविन्ददेव गिरिजी ने अपने संदेश में कहा कि समत्व का जीवन जीना ही तो भगवतगीताकार योग है। उन्होंने कहा कि अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि विश्व के 117 देशों से तीन लाख से अधिक साधक 10 भाषाओं में गीता सीख रहे हैं। इसे देखकर लगता है कि यह कार्य हम नहीं बल्कि स्वयं श्री कृष्ण कर रहे हैं। उनकी ही कृपा से यह कार्य सम्पन्न हो रहा है-निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन्! उन्होंने कहा कि धन्य है वे लोग जो गीता पढ़ते हैं, पढ़ाते हैं तथा जीवन में लाते है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि आईये गीता मैत्री परिवार ने जो गीता ज्ञान अमृत की धारा प्रवाहित की है उसमें गोते लगाकर अपने और अपनी आने वाली पीढ़ियों का जीवन धन्य बनाये।

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