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सत्य को जीना ही है, जीवन का उद्देश्य।


सामान्यतया लोगों को गुह्य ज्ञान की शिक्षा नहीं मिलती। उन्हें बाह्य शिक्षा दी जाती है। जहां तक सामान्य शिक्षा का संबंध है उसमें राजनीति, समाजशास्त्र, भौतिकी, रस्यानशास्त्र, गणित, जोतिस विज्ञान, इंजीनियरिंग आदि शिक्षा लेने में ही हम व्यस्त रहते हैं। विश्वभर में ज्ञान के अनेक विभाग हैं। और उनके अनेक विश्वविद्यालय हैं। किंतु दुर्भाग्यवस कोई ऐसे विश्वविद्यालय या शैक्षणिक संस्थान नहीं है जिनमे आत्मविध्या की शिक्षा दी जाती हो। फिर भी आत्मा शरीर का महत्वपूर्ण अंग है। आत्मा के बिना शरीर महत्वहीन है। तो भी लोग आत्मा की चिंता न करके जीवन की शाररिक आवस्यकताओं को अधिक महत्व देते हैं।
इसलिए उपरोक्त लिखित सभी शिक्षा सामन्य शिक्षा में आती हैं जिससे मात्र जीविकोपार्जन किया जा सकता है। ए शिक्षाएं भवसागर पार कराने में अक्षम हैं। इन का अस्तित्व मिर्तू के बाद समाप्त हो जाता है। परंतु राजविध्या राजगुह्यम अत्यंत गोपनीय जो भीतर से बाहर आती है वह हमें ब्रह्मज्ञानी संत से ही प्राप्त हो सकती है। जो मानव मात्र का परम लक्ष्य है।
(S B G yatharoop)

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