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“वह बिंदास जी गई जिंदगी”


लेखक: प्रभात उप्रेती ( लैक्चरर)

एक लड़की
मोटी, गोरी, गुदगुदी
कुमाऊंनी लड़की
दुनियावी नाम भगवती
प्यार का नाम डुकुल

शादी हुई
‘दुधो नहाओ पुतो फलो’ के अंदाज में
छह बच्चे हुए
क्रमश: नाती पोते
और जो होने वाला ठहरा
पति से कंधे से कंधा मिलाकर
संघर्ष किया
उसने धूप में बनाई बड़ियां
ताप में लजीज खाने
तब हम उसके बच्चे
इतने ईजामय हो गए थे
कि आज भी हर चोट में
मुंह से निकलता
ओईजा

उसने आम महिला की तरह फसक
काट और नई मौजों
मोबाइल रसमलाई के भी मजे लिए
यथार्थवादी अंदाज में पति की
राम की पेंशन का भी बेलेंस बनाए रखा
उसमे जीने की लपट थी
दमकती चमकती
ठसक से अपनी बात रखती
वह एक अंदाज थी….

अपने प्रिय भजन में
सुनहरी आवाज में
उसने भगवान को शिकायत भी लगाई
दीन बंधु दीनानाथ काहे तुम कहाए हो…

उम्र बढ़ती गई
डीजे के हंगामे में
उदास होते शकुनाखर गाए
ऐंपड़ दिए

98 साल उसने निचोड़ निचोड़ कर पिए
और ब्रेन हैमरेज, कोविड, अल्जाइमर को भी पचा लिया
फिर एक गहरी नींद की सुरंग में डूबती हुई
वह नहीं रही

कभी कभी ना रहना रहने से बेहतर होता है
उसने बेहतरी जीई
और अग्निपथ को वरण किया

उसमें कोई विशेषता ना थी
सिवाय कि वो हमारी मां थी
शायद मांओं की विशेषता नहीं होती
हम सबकी मांएं ऐसी होती हैं

जिंदगी में शांति
कुछ बुद्धों को ही मिलती है
पर मौत शांति का सबब नहीं

मरघट में उसे अग्निवीर बनाते
बुझती आग की शाम में वापस आते
एक गीत मुंह से लग लिया
ना जाने क्यों जिंदगी में होता है कई बार
कर के किसी की याद
छोटी छोटी सी बात

अलविदा ओई-जा!

न कहें नमन
न शांति
वह बिंदास जी गई
जिंदगी

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