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ट्राइडेंट ग्रुप ने लगाई पहली क्राफ्ट एंड डिजाइन वर्कशॉप, पारंपरिक भारतीय कलाओं से रूबरू हुए प्रतिभागी

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ट्राइडेंट ग्रुप ने लगाई पहली क्राफ्ट एंड डिजाइन वर्कशॉप, पारंपरिक भारतीय कलाओं से रूबरू हुए प्रतिभागी

पॉटरी, बाटिक और गोंड कला के साथ रचनात्मक गतिविधियों में 100 से अधिक लोगों ने लिया हिस्सा

लुधियाना /चंडीगढ़ : ट्राइडेंट ग्रुप ने भारतीय कला और शिल्प की समृद्ध विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने के उद्देश्य से पहली दो दिवसीय क्राफ्ट एंड डिजाइन वर्कशॉप का आयोजन अपने लुधियाना ऑफिस परिसर में किया। इसमें देश के जाने-माने कलाकारों, रचनात्मक संस्थानों, कर्मचारियों और बच्चों सहित 100 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों को पारंपरिक कला विधाओं को करीब से जानने के साथ खुद उन्हें आजमाने का भी मौका मिला।वर्कशॉप में पॉटरी, बाटिक कला, गोंड कला और डू-इट-योरसेल्फ (डीआईवाई) से जुड़ी चार प्रमुख गतिविधियां आयोजित की गईं। इन सत्रों के जरिए प्रतिभागियों ने अलग-अलग कला विधाओं की बारीकियां समझीं, नई तकनीकें सीखीं और अपने हाथों से कलाकृतियां तैयार कीं। विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी कलाकारों और संस्थानों ने इन सत्रों का संचालन किया।

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बाटिक कला की वर्कशॉप हिमांशु आर्ट इंस्टीट्यूट, दिल्ली ने आयोजित की, जिसमें प्रतिभागियों को इस पारंपरिक कला की बारीक तकनीकों और विशिष्ट डिजाइनों से परिचित कराया गया। भोपाल के मास्टर आर्टिस्ट आनंद कुमार श्याम ने गोंड कला की बारीकियां सिखाईं और चित्रों के माध्यम से कहानी कहने की इसकी समृद्ध परंपरा से प्रतिभागियों को रूबरू कराया।

पॉटरी सेशन का संचालन क्रिएटिव आर्ट्स इंस्टीट्यूट, लुधियाना ने किया। इसमें प्रतिभागियों ने मिट्टी को आकार देकर कलाकृतियां बनाने का अनुभव लिया। वहीं, ऑबर्जीन, लुधियाना की ओर से आयोजित डीआईवाई वर्कशॉप में प्रतिभागियों को अपनी कल्पना और रचनात्मकता को नए रूप में अभिव्यक्त करने का अवसर मिला।वर्कशॉप का मुख्य उद्देश्य भारत की पारंपरिक कला और शिल्प विरासत के संरक्षण के साथ उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना था। विभिन्न सत्रों ने प्रतिभागियों को भारतीय शिल्पकला की परंपराओं, तकनीकों और उसके पीछे छिपी रचनात्मकता को समझने का अवसर दिया। कलाकारों और प्रतिभागियों के सीधे संवाद ने उन कलाकारों और कारीगर समुदायों के योगदान को भी सामने रखा, जो पीढ़ियों से इन कला विधाओं को जीवित रखे हुए हैं।

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बच्चों के लिए वर्कशॉप नई कला विधाओं को जानने, कल्पनाशक्ति को विकसित करने और रचनात्मक कौशल सीखने का माध्यम बनी। वहीं वयस्कों को भारतीय सांस्कृतिक जड़ों से दोबारा जुड़ने और पारंपरिक शिल्प को सहेजकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के महत्व को समझने का अवसर मिला।

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तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच इस पहल ने पारंपरिक भारतीय कला और शिल्प को समकालीन जीवन से जोड़ने की जरूरत को भी रेखांकित किया। नई पीढ़ी को इन कलाओं से परिचित कराने और इनके सांस्कृतिक महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाकर ट्राइडेंट ग्रुप की इस पहल ने परंपरा और आधुनिक जीवन के बीच एक रचनात्मक सेतु बनाने का प्रयास किया।

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