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श्रीमद्भागवत कथा के माध्यम से सच्चिदानंद प्रभु की प्राप्ति होती है : ज्योतिष सम्राट पूज्य राघव ऋषि जी


चण्डीगढ़ : सेक्टर 32 डी स्थित सनातन धर्म मंदिर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का श्रीगणेश करते हुए अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वक्ता श्रीविद्या सिद्ध संत एवं ज्योतिष सम्राट पूज्य राघव ऋषि जी ने कहा कि साधना से ही साधन स्थिर होता है। भागवत कथा तीनों प्रकार के तापों को नष्ट करती है। ऋषि सेवा समिति, चण्डीगढ़ के तत्वावधान में आयोजित भागवत कथा के प्रथम दिवस व्यासपीठ पर पूज्य ऋषिजी का सविधि पूजन मुख्य यजमान सावित्री देवी एवं हरिश्चन्द्र दुबे द्वारा किया गया।

भागवत कथा का प्रारम्भ करते हुए पूज्य ऋषि जी ने कहा कि काशी की ज्योतिर्मयी भूमि पर अक्षय कथा को प्राप्त कर हम सभी धन्य हैं ताकि अक्षय लाभ प्राप्त हो सके। कथा के माध्यम से सच्चिदानंद प्रभु की प्राप्ति होती है। जो आनन्द हमारे भीतर है उसे जीवन में किस प्रकार प्रकट करें यही भागवत शास्त्र सिखाता है। जैसे दूध में मक्खन रहता है फिर भी वह दिखाई नहीं देता, मंथन करने पर मिल जाता है। इसी प्रकार मानव मन को मंथन करके आनंद को प्रकट करना है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य है परमात्मा से मिलना। उसीका जीवन सफल है जिसने प्रभु को प्राप्त किया।

भागवतशास्त्र का आदर्श दिव्य है। घर में रहकर के भगवान को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। इस शास्त्र में सिखाया है। गोपियों ने घर नहीं छोड़ा। घर गृहस्थी का काम करते हुए भी भगवान को प्राप्त कर सकी। एक योगी को जो आनन्द समाधि में मिलता है वही आनंद आप घर में रहकर भी प्राप्त कर सकते हैं। पूज्य ऋषि जी के एकमात्र सुपुत्र सौरभ ऋषि जी ने गणपति वन्दना “गौरी के नंदन की हम पूजा करते हैं” का गान किया सब भावविभोर हो अनेक श्रद्धालु नृत्य करने लगे। भागवत की रचना व्यास जी ने की परन्तु इसे गणेश जी ने लिखा है। इस कथा का माहात्म्य है कि जिस समय शुकदेव जी परीक्षित को कथा सुना रहे थे उस समय स्वर्ग के देवता आए एवं उन्होंने कहा स्वर्ग का अमृत हम राजा को देते हैं और बदले में यह कथामृत आप हमें दीजिए। शुकदेव जी ने पूछा तुम्हें कौन सा अमृत पीना है? इस पर राजा ने कहा कि स्वर्ग का अमृत पीने से पुण्यों का क्षय होता है परन्तु कथामृत पीने से जन्म जन्मांतर के पापों का क्षय होता है व जीव पवित्र है जाता है। अतः मैं इस कथामृत का ही पान करूंगा। मनुष्य के भीतर ज्ञान और वैराग्य जो सोए हुए हैं उन्हें जागृत करने के लिए यह कथा है। इस हृदयरूपी वृन्दावन में कभी कभी वैराग्य जागृत होता है परन्तु स्थाई नहीं रहता उसे स्थायित्व इस कथा से मिलता है।

कथा के माहात्म्य की चर्चा करते हुए पूज्यश्री जी ने बताया कि तुंगभद्रा नदी के किनारे आत्मदेव नाम का ब्राह्मण रहता था उसकी पत्नी धुंधली क्रूर स्वभाव की थी। पुत्रहीन होने के कारण आत्मदेव एक दिन आत्महत्या करने जाता है। मनुष्य शरीर ही तुंगभद्रा है इसमें जीवात्मा रूपी आत्मदेव निवास करता है तर्क कुतर्क करने वाली बुद्धि ही धुंधली है किसी सन्त की कृपा से विवेक रूपी पुत्र का जन्म होता है जो जीव का कल्याण करता है। धुंधली का पुत्र धुंधकारी अनाचारी था जो व्यक्ति अनाचारी होता है वह क्रमशः रूप,रस, गन्ध, शब्द, व स्पर्श रूपी पांच वेश्याओं से फंस जाता है जो इस जीवात्मा की हत्या कर देती है फलत वह प्रेत योनि में जाता है जो भागवतशास्त्र के माध्यम से मुक्त होता है।

भगवान सच्चिदानंद हैं आनन्द मनुष्य धन, पद, परिवार व प्रतिष्ठा में ढूंढता है जबकि आनन्द उसके भीतर है। जीव तो ईश्वर का है तो भी वह उनको पाने का प्रयास नहीं करता इसी लिए वह दुखी होता है नास्तिक भी अन्त में थक हारकर भगवान को शान्ति के रूप में खोजता है जो साधन जन्य नहीं स्वयंजन्य है। उसी जीव का जीवन सफल होता है जो प्रत्यक्षत प्रभु का दर्शन कर मुक्त होता है नैमिषारण्य की पावन भूमि में शौनक आदि अट्ठासी हजार ऋषियों ने श्रीसूतजी से कथा का श्रवणपान किया। देवर्षि नारद जी ने अपने पूर्व जन्म की कथा को व्यास जी से बताते हुए कहा कि मेरा जीवन संत और सत्संग से सुधरा है। राधा जी की सिफारिश पर तम्बूरा प्रसाद के रूप में दिया और कहा मुझसे अलग हुए अधिकारी जीवों को हमारे पास लाओ यह वीणा लिए मैं संसार में भ्रमण करता हूं और अधिकारी जीवों को जैसे ध्रुव, प्रह्लाद आदि को भगवान के पास ले गया। जो भक्त मिलते हैं उन्हें प्रभु के पास ले जाता हूं।

महाभारत युद्ध की चर्चा करते हुए पूज्य ऋषि जी ने कहा कि संपत्ति का मोह जहां होता है वहां महाभारत और त्याग रामराज्य को लाता है। परीक्षित गद्दी पर बैठे और एक दिन सोने का मुकुट जो अनीति से प्राप्त धन था धारण किया। अनीति से कमाया हुआ धन कमाने वाले और वारिश दोनों को दुखी करता है इस कारण उन्होंने उस दिन अनेकों हिंसा की और एक सन्त का अपमान किया। अन्त में शुकदेव जी आकर परीक्षित को धन्य किए।

कथा के अन्त में सर्वश्री श्रीकृष्ण चन्द्र मिश्रा, गजेन्द्र नाथ पाण्डेय, माम चन्द गुप्त, प्यारचंद, नरेश कुमार, संजीव सिंगला, बिशन लाल बिसेन, अच्छर सिंह, गणेश दुबे, राम पाल ऐरी, राम स्वार्थ यादव, अनिल श्रीवास्तव, बलराम शर्मा सहित अनेक भक्तों ने आरती की। मीडिया प्रभारी सच्चिदानंद दुबे ने बताया कि सोमवार की कथा में कपिलोपाख्यान, देवहूति कर्दम संवाद एवं ध्रुव चरित्र का भावपूर्ण प्रसंग होगा।

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